न्यायमूर्ति विजेंद्र जैन का निधन: कुछ ही महीनों में दोहरी शोक

नई दिल्ली. पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायधीश और भारतीय ज्ञानपीठ के अध्यक्ष न्यायमूर्ति विजेंद्र जैन का 28 फरवरी को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में निधन हो गया. वह 79 वर्ष के थे. उनके पार्थिव शव को दिल्ली लाया गया और उनका अंतिम संस्कार दिल्ली के निगमबोध घाट पर 1 मार्च को किया गया. उनके देहावसान से न्यायपालिका और समाज को गहरा आघात पहुंचा है. यह दुख और भी मार्मिक इसलिए है क्योंकि कुछ ही महीने पहले 19 अगस्त 2025 में उनकी धर्मपत्नी कुमुद जैन का भी निधन हो गया था.

जस्टिस विजेंद्र जैन पर्यावरण के प्रति सजग थे. वह पर्यावरण को लेकर दिये फैसलों के लिए जाने जाते थे इसीलिए उनके बेंच को ग्रीन बेंच कहा जाने लगा था. यमुना नदी के संरक्षण, दिल्ली में गैरकानूनी कंस्ट्रक्शन को रोकने और जामा मस्जिद के रेस्टोरेशन को लेकर उनका फैसला अधिक चर्चा में रहा था. जस्टिस जैन का जीवन कर्तव्यनिष्ठा और संवेदनशीलता का प्रतीक रहा. उन्होंने यह सिद्ध किया कि न्यायाधीश केवल कानून का ज्ञाता ही नहीं, बल्कि समाज का मार्गदर्शक भी होता है.

जस्टिस जैन सरल, सहज और मिलनसार व्यक्ति के धनी थे. वह अक्सर कहते थे कि घबराने से नहीं बल्कि धैर्य,शांत मन और बुद्धिमानी के साथ उसका सामना करना चाहिए. बीते कुछ समय से जस्टिस जैन को लंग्स की समस्या थी इसलिए प्रदूषण बढ़ने पर अक्सर दिल्ली से रायपुर चले जाते थे. बीते वर्ष अगस्त में ही उनकी पत्नी कुमुद जैन का निधन हो गया था. उनके निधन के बाद जस्टिस जैन के जीवन में जो रिक्तता आई थी. उसकी भरपाई संभव नहीं. जैन साहब के लिए कुमुद जैन एक प्रेरणा थी. शायद यही वजह है कि जैन साहब भी कुमुद जैन के पीछे-पीछे चल दिये. जस्टिस जैन अपने पीछे न्याय, सादगी और मानवीय मूल्यों की एक अमिट छाप छोड़ गए, जिनका अनुकरण करना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है.

जस्टिस जैन के साथ पत्रकार दीपक राजा व विदेश सेवा में कार्यरत विपिन बरनवाल.

जीवन परिचय – जस्टिस विजेंद्र जैन का जन्म दिल्ली के एक सामान्य परिवार में 2 अगस्त, 1946 हुआ था. इनका परिवार दिल्ली के सदर बाजार के पास पहाड़ी धीरज में रहते थे. इनके पुरखे 1863 ई. में हरियाणा से पलायन करके दिल्ली आए और फिर यहीं बस गए. जैन साहब की स्कूली शिक्षा दिल्ली में ही हुई और कानून की पढ़ाई दिल्ली विश्वविद्यालय में पूरी की और 25 जुलाई, 1969 में अपनी वकालत शुरू की. उनका पूरा न्यायिक करियर भी मुख्य रूप से दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों (पंजाब और हरियाणा) तक केंद्रित रहा.

उन्होंने मुख्य रूप से दीवानी (Civil), संवैधानिक, कराधान (Taxation) और कंपनी मामलों में वकालत की. उनकी कानूनी विशेषज्ञता को देखते हुए मई 1990 में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा उन्हें वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में नामित किया गया. फिर, वे 24 दिसंबर 1992 को दिल्ली उच्च न्यायालय के स्थायी न्यायाधीश नियुक्त हुए, जहाँ उन्होंने 13 वर्षों से अधिक समय तक सेवा दी. उन्हें पहले दिल्ली हाईकोर्ट के कार्यकारी मुख्य न्यायधीश बनाया गया और फिर उन्हें 28 नवंबर 2006 को पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया. इसी पद से जस्टिस जैन 1 अगस्त 2008 को सेवानिवृत्त हुए. सेवानिवृत्ति के बाद, उन्होंने हरियाणा मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया. वे विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता केंद्रों (जैसे सिंगापुर, हांगकांग और दुबई) के सदस्य भी रहे.

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