पटना. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने शताब्दी वर्ष में पंच परिवर्तन का कार्यक्रम निर्धारित किया है. ये पांच परिवर्तन हैं – स्व का बोध तथा स्वदेशी का उपयोग, कुटुंब प्रबोधन, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण और नागरिक कर्त्तव्य बोध. इन पंच परिवर्तनों के माध्यम से समाज और राष्ट्र सशक्त होगा. यह बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह आलोक कुमार ने पटना के विजय निकेतन में आयोजित संघ शताब्दी वर्ष के अंतर्गत प्रमुख जन संगोष्ठी में कही.
उन्होंने कहा कि प्रकृति के विकास में ही सबका विकास है. भारतीय संस्कृति में प्रकृति को माता का स्थान दिया गया है. प्रकृति को छोड़कर कोई विकास संभव नहीं है. पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की नहीं बल्कि प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है. हम लोगों का नारा है – “वृक्ष लगाओ, जल बचाओ और प्लास्टिक हटाओ.”
उन्होंने कहा कि संस्कारों की प्रथम पाठशाला अपना परिवार होता है. यदि परिवार सशक्त है तो समाज सशक्त होगा. आज एकल परिवार, पीढ़ियों का टकराव और नैतिक शून्यता चिंता का विषय है. भारतीय संस्कृति में परिवार केवल सुविधा नहीं बल्कि संस्कारों की प्रयोगशाला है. डॉक्टर हेडगेवार स्वयं कहते थे अच्छा स्वयंसेवक वही है जो घर, समाज और राष्ट्र तीनों के प्रति उत्तरदायी है. यदि परिवार सुसंस्कृत है तो व्यक्ति को अलग से चरित्र निर्माण की पाठशाला की आवश्यकता नहीं पड़ती. वास्तव में कुटुंब प्रबोधन वह आधार है जहां से चरित्रवान नागरिक का निर्माण होता है. पंच परिवर्तन के माध्यम से ही आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना की जा सकती है.
इसी प्रकार सामाजिक समरसता पंच परिवर्तन की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है. भारत की विविधता- जाति, भाषा, पंथ, क्षेत्र हमारी शक्ति है; यदि उसमें भेद नहीं भाव हो। सामाजिक समरसता का तात्पर्य हर व्यक्ति को सम्मान देना है. जब समाज समरस होता है तभी राष्ट्र एकजुट होकर चुनौतियों का सामना कर सकता है.
उन्होंने बताया कि स्व के बोध का तात्पर्य अपने अस्तित्व, अपने कर्तव्य और अपनी भूमिका को सही रूप से समझना है. इसके साथ स्वदेशी वस्तुओं के बारे में आग्रह भी करना है. स्व आधारित जीवन का तात्पर्य है कि आर्थिक एवं सांस्कृतिक सभी आयामों में हमें स्वयं के पैरों पर खड़ा होना है. आत्मनिर्भरता के अभाव में दूसरों के ऊपर हमारे निर्भरता बढ़ जाएगी और हम सुरक्षा के शिकार बने रहेंगे। और सबसे महत्वपूर्ण है नागरिक कर्तव्य बोध. हर व्यक्ति राष्ट्र सेवक है. पूरा समाज अपना परिवार है, इसीलिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक किसी भी राष्ट्रीय आपदा में हमेशा सबसे आगे रहते हैं.
कोरोना के काल में जब बड़ी-बड़ी संस्थाओं ने हाथ खड़े कर दिए तब संघ के स्वयंसेवकों ने अपने कर्तव्य बोध को समझते हुए सेवा के लिए तत्पर दिखे. संघ का स्वयंसेवक आपदा, महामारी, सामाजिक संकट जैसी विकट परिस्थिति में बिना नाम यश की चिंता किए सेवा करता है. यही कर्तव्य बोध का जीवंत उदाहरण है.
