‘नए लोकतंत्र के दौर में भारत’

वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्र देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद पत्रकारिता शिखर सम्मान से सम्मानित
वरिष्ठ पत्रकार सुबोध कुमार नंदन को मिला उत्कृष्ट रिपोर्टिंग के लिए केशवराम भट्ट पत्रकारिता सम्मान
बाबूराव पटेल रचनाधर्मिता सम्मान से सम्मानित हुए वरिष्ठ छायाकार दीपक कुमार

पटना। भारत पश्चिम के लोकतंत्र से आजादी प्राप्त कर ली है। इसके 80 साल बाद भारत नए लोकतंत्र के दौर में है और लोकतंत्र की नई परिभाषा गढ़ रहा है। नए लोकतंत्र को गढ़ने में कई सामाजिक प्रश्न हल करने होंगे। बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने भी कहा था कि देश में संविधान स्वीकार करने के साथ राजनीतिक लोकतंत्र को प्राप्त कर लिया है परंतु आने वाला समय सामाजिक लोकतंत्र का होगा। उक्त बातें पद्म भूषण से सम्मानित देश के चर्चित पत्रकार रामबहादुर राय ने शनिवार को कही। वह विश्व संवाद केंद्र द्वारा आयोजित आद्य पत्रकार देवर्षि नारद स्मृति कार्यक्रम में बतौर मुख्य वक्ता कह रहे थे.

‘भारत के लोकतंत्र की आंतरिक शक्ति’ विषयक संगोष्ठी को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी भारत के ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने भारत के संविधान को शत प्रतिशत स्वीकार किया है। पहले के सारे प्रधानमंत्रियों ने संविधान में अपने-अपने तरीके से परिवर्तन के प्रयास किए। सबसे पहले पं. जवाहरलाल नेहरू ने 18 मई, 1951 को बने बनाए संविधान में असंवैधानिक तरीके से संशोधन कराया जिसमें नागरिक अधिकारों पर आंशिक अंकुश लगाने का संदर्भ था। इसके बाद इंदिरा गांधी ने तो संविधान की हत्या ही कर दी। नरेंद्र मोदी संभवतः एकमात्र प्रधानमंत्री हैं जो सार्वजनिक समारोहों में भारत को लोकतंत्र की जननी बताते हैं।

उन्होंने 25 नवंबर, 1949 को भीमराव अंबेडकर द्वारा संविधान पर दिए गए भाषण का उल्लेख करते हुए कहा कि सामाजिक लोकतंत्र को अपनी आंतरिक शक्ति से ही भारत प्राप्त कर सकता है, क्योंकि भारत में भले ही कोई पॉलीटिशियन बेईमान, पदलोलुप या भ्रष्ट हो सकता है लेकिन यहां का नागरिक अपने लोकतांत्रिक कर्तव्य के प्रति हमेशा से ईमानदार रहा है और यही भारतीय लोकतंत्र की आंतरिक शक्ति है।

आईआईटी पटना के निदेशक प्रोफेसर टी एन सिंह ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि यह संगोष्ठी अति आवश्यक विषय पर आयोजित की गई है क्योंकि कई बार लोकतंत्र में दिखता कुछ और है तथा होता कुछ और है। भारत जैसा विशाल देश तमाम चुनौतियों का सामना करते हुए एक परिपक्व लोकतंत्र की ओर तेजी से बढ़ रहा है, यह संतोष की बात है।

इस पत्रकार सम्मान समारोह में वर्ष- 2026 के लिए देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद पत्रकारिता शिखर सम्मान वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्र को प्रदान किया गया। वहीं उत्कृष्ट रिपोर्टिंग के लिए केशवराम भट्ट पत्रकारिता सम्मान वरिष्ठ पत्रकार सुबोध कुमार नंदन को तथा बाबूराव पटेल रचनाधर्मिता सम्मान वरिष्ठ छायाकार दीपक कुमार को प्रदान किया गया। पत्रकार सम्मान समिति की जानकारी वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर ने की। वहीं सम्मानों की घोषणा वरिष्ठ पत्रकार कृष्णकांत ओझा ने की। सम्मानित पत्रकारों के संक्षिप्त जीवन वृत्त को दर्शाते हुए एक डॉक्यूमेंट्री का भी प्रदर्शन किया गया।

इससे पूर्व विषय प्रवेश कराते हुए वरिष्ठ पत्रकार प्रियरंजन भारती ने कहा कि भारत ने ढाई हजार वर्ष पूर्व से ही पूरे विश्व के लिए लोकतंत्र का एक स्पष्ट ढांचा प्रस्तुत किया था और इसकी जो आंतरिक शक्ति है, वह भारत के प्रत्येक नागरिक के चैतन्य में स्थित है। विश्व संवाद केंद्र के सचिव व दीघा के विधायक डॉ. संजीव चौरसिया ने अपने स्वागत संबोधन में विश्व संवाद केंद्र द्वारा विगत 27 वर्षों के महत्वपूर्ण पड़ाव की चर्चा की। उन्होंने बताया कि आद्य पत्रकार देवर्षि नारद स्मृति कार्यक्रम में पत्रकारों को सम्मानित किया जाता है तथा प्रत्येक वर्ष जनवरी में 12 दिनों का नागरिक पत्रकारिता कार्यशाला का आयोजन किया जाता है। इसमें प्रशिक्षित पत्रकार देश के विभिन्न मीडिया संस्थानों में सक्रिय पत्रकारिता कर रहे हैं। इस वर्ष पत्रकारिता कार्यशाला के प्रतिभागियों को इस अवसर पर मुख्य अतिथि राम बहादुर राय और कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रो. टीएन सिंह द्वारा प्रमाणपत्र प्रदान किया गया। मंच संचालन विश्व संवाद केंद्र के संपादक संजीव कुमार ने किया। वहीं, धन्यवाद ज्ञापन संवाद केंद्र के न्यासी अभिषेक कुमार ने किया।

इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र कार्यवाह डॉ. मोहन सिंह, क्षेत्र के प्रचार प्रमुख राजेश पाण्डेय, बिहार लोक सेवा आयोग के सदस्य प्रो. अरुण भगत, बीबीए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो ऋषि राय, टीपीएस कॉलेज के प्राचार्य प्रो. तपन शांडिल्य, प्रो. मधु वर्मा, फिल्मकार प्रशांत रंजन, रीतेश परमार, अर्थशास्त्री डॉ. सुधांशु कुमार, डॉ. नीरज कृष्ण, वरिष्ठ पत्रकार देवेंद्र मिश्र, राकेश प्रवीर, अवध कुमार समेत राजधानी के पत्रकार, छायाकार, जनसंचार के प्राध्यापक, विद्यार्थी व समाज के अन्य बुद्धिजीवी बड़ी संख्या में उपस्थित थे।

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