रुकी हुई आशा, लेकिन टूटी नहीं: प्रो. रूबी मिश्रा

सदियों से भारतीय समाज में नारी को शक्ति, सृजन और संवेदना का प्रतीक माना गया है। वह केवल परिवार की आधारशिला ही नहीं, बल्कि संस्कृति और सभ्यता की वाहक भी रही है। इतिहास के प्रत्येक दौर में—चाहे संघर्ष का समय हो या निर्माण का नारी ने अपने धैर्य, त्याग और समर्पण से समाज को नई दिशा प्रदान की है। इसके बावजूद, विडंबना यह रही कि जिस नारी ने समाज को संबल दिया, उसी की आवाज़ को लंबे समय तक अनसुना किया गया और उसके अधिकारों को सीमित रखा गया।

समय के साथ यह स्थिति धीरे-धीरे बदली है। शिक्षा, जागरूकता और सामाजिक आंदोलनों के प्रभाव से महिलाओं में अपने अधिकारों के प्रति सजगता बढ़ी है और उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है। राजनीति भी इस परिवर्तन से अछूती नहीं रही, किंतु यह क्षेत्र अब भी मुख्यतः पुरुष-प्रधान बना हुआ है। इसी असंतुलन को दूर करने के उद्देश्य से नारी शक्ति वंदन अधिनियम एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आया है। यह अधिनियम लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को एक-तिहाई (33 प्रतिशत) आरक्षण प्रदान करने का प्रावधान करता है। यह केवल एक विधेयक नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र को अधिक समावेशी और प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। इससे यह आशा जगी है कि निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी और उनके दृष्टिकोण को नीति-निर्माण में उचित स्थान मिलेगा। जब महिलाएँ राजनीति में सशक्त रूप से भाग लेंगी, तब समाज के उन वर्गों की आवाज़ भी प्रभावी ढंग से सामने आएगी, जो अब तक हाशिए पर रहे हैं।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम, जिसे संविधान (एक सौ छठा संशोधन) अधिनियम, 2023 के रूप में जाना जाता है, सितंबर 2023 में संसद द्वारा पारित किया गया था। अप्रैल 2026 में इसकी अधिसूचना जारी की गई और 16 अप्रैल 2026 से यह कानून प्रभावी हो गया। हालांकि, इसका वास्तविक कार्यान्वयन जनगणना और परिसीमन (डिलिमिटेशन) की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही संभव होगा। इस बीच, 2029 के आम चुनावों से पहले इसे लागू करने के उद्देश्य से संबंधित संशोधन और परिसीमन विधेयकों पर संसद में चर्चा हुई, किंतु लोकसभा में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत न मिलने के कारण वे पारित नहीं हो सके। यह स्थिति निस्संदेह निराशाजनक है, क्योंकि इससे करोड़ों महिलाओं की आकांक्षाओं को अस्थायी झटका लगा है। इस ठहराव को अंतिम बाधा नहीं माना जाना चाहिए।

इस अधिनियम के पीछे केवल समानता का सिद्धांत ही नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का मूल विचार भी निहित है। जब देश की लगभग आधी आबादी महिलाएँ हैं, तो उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व का भी संतुलित होना आवश्यक है। वर्तमान में संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या अपेक्षाकृत कम है, जो यह दर्शाती है कि उन्हें समान अवसर अभी भी पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं हो पाए हैं। ऐसे में यह अधिनियम उस खाई को पाटने का एक सार्थक प्रयास है।

भारतीय लोकतंत्र की प्रक्रिया में यह एक अस्थायी व्यवधान मात्र है, जो दीर्घकाल में इसे और अधिक मजबूत तथा समावेशी बनाने में सहायक हो सकता है। इतिहास साक्षी है कि कोई भी बड़ा सामाजिक परिवर्तन सहज रूप से नहीं आता; इसके लिए संघर्ष, धैर्य और समय की आवश्यकता होती है। महिलाओं के अधिकारों की यात्रा भी इसी क्रम का हिस्सा है। आज की नारी पहले की अपेक्षा कहीं अधिक शिक्षित, जागरूक और आत्मनिर्भर है। वह अपने अधिकारों के प्रति सजग है और उन्हें प्राप्त करने के लिए दृढ़ संकल्पित भी है। अब वह केवल घर की सीमाओं तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि समाज और राष्ट्र-निर्माण में सक्रिय भागीदारी निभाना चाहती है। यह परिवर्तन केवल बाहरी स्तर पर ही नहीं, बल्कि मानसिक और वैचारिक स्तर पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जहाँ नारी ने स्वयं को एक सशक्त इकाई के रूप में स्वीकार कर लिया है।

राजनीति में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के सकारात्मक परिणाम भी स्पष्ट रूप से सामने आए हैं। जहाँ-जहाँ महिलाओं को नेतृत्व का अवसर मिला है, वहाँ विकास के नए आयाम स्थापित हुए हैं। पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को दिया गया आरक्षण इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। इससे यह सिद्ध होता है कि जब महिलाओं को अवसर मिलता है, तो वे न केवल प्रभावी नेतृत्व करती हैं, बल्कि समाज के कमजोर और वंचित वर्गों के प्रति अधिक संवेदनशील निर्णय भी लेती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में महिला सरपंचों और पंचायत प्रतिनिधियों द्वारा स्वच्छता, शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण से संबंधित योजनाओं का सफल क्रियान्वयन इसकी पुष्टि करता है।इस संदर्भ में नारी शक्ति वंदन अधिनियम की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है।

हालाँकि, हालिया घटनाक्रम ने कुछ हद तक निराशा उत्पन्न की है, किंतु इसे अंतिम पराजय नहीं कहा जा सकता। यह एक अस्थायी विराम है, जो आगे की रणनीति और प्रयासों को और अधिक सुदृढ़ बनाएगा। समाज में बढ़ती जागरूकता और महिलाओं की सक्रिय भागीदारी यह संकेत देती है कि अब इस मुद्दे को लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। राजनीतिक दलों के बीच सहमति बनाने की प्रक्रिया जारी है और विभिन्न स्तरों पर समाधान तलाशे जा रहे हैं। भविष्य की दिशा स्पष्ट है—महिलाओं को राजनीति में उनका न्यायसंगत प्रतिनिधित्व अवश्य मिलना चाहिए। इसके लिए केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति ही नहीं, बल्कि सामाजिक समर्थन और मानसिकता में बदलाव भी आवश्यक है। साथ ही, राजनीतिक दलों को अपने आंतरिक ढाँचे में भी महिलाओं को समान अवसर प्रदान करने होंगे, विशेष रूप से टिकट वितरण और नेतृत्व के स्तर पर।

यह कहा जा सकता है कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम भले ही वर्तमान में कुछ चुनौतियों का सामना कर रहा हो, किंतु इससे जुड़ी आशा अभी भी जीवित है। यह आशा उस अटूट विश्वास में निहित है, जो हर महिला अपने भीतर संजोए रखती है—समानता, सम्मान और अधिकारों का विश्वास। नारी केवल सहनशीलता का प्रतीक नहीं, बल्कि परिवर्तन की धुरी है। जब वह संकल्प लेती है, तो इतिहास की दिशा बदल जाती है। यह अधिनियम भी एक दिन अपने पूर्ण उद्देश्य को अवश्य प्राप्त करेगा, क्योंकि यह केवल एक कानून नहीं, बल्कि न्याय और समानता की उस निरंतर यात्रा का हिस्सा है, जिसे अब कोई भी शक्ति रोक नहीं सकती।

(आलेख की लेखिका प्रो. रूबी मिश्रा हैं. वह वह दिल्ली विश्वविद्यालय के भगिनी निवेदिता महाविद्यालय की प्राचार्या हैं.)

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